Posted in कविता, प्यार, सुन्दरता | Tagged कोयल सी आवाज़, चाँद सी मोहक, मधु सी मिठास, वो मेरी महबूबा है, सलोनी सी सूरत, wo meri mehbooba hai | 5 Comments »
समय के सफ़र में प्रहर जब रात का आया,
कोई भूल गया वो अपना साथी जो था !
मंजिल की दौर में प्रहर जब हार का आया,
कोई भूल गया वो अपना साथी जो था !
जीत की ख़ुशी में, हार के गम में,
याद आ गया वो अपना साथी जो था !
मन के अन्तः करण में जब प्यार को संजोया,
याद आ गया वो अपना साथी जो था !
नित्य कृत पर्व में, गर्त में, प्रशाध्य में,
श्रीन्खलाय मार्ग में, ज्ञान के प्रवाह में,
सांख्य स्मृति में, जीवन के अध्याय में,
हर पल के बहाव में,
याद आ गया वोह अपना साथी जो था,
याद आ गया वोह अपना साथी जो था !
मेघ के प्रवाह में प्रहर जब वेदना का आया,
कोई भूल गया वो अपना साथी जो था !
समय के सफ़र में प्रहर जब हार का आया,
कोई भूल गया वो अपना साथी जो था,
कोई भूल गया वो अपना साथी जो था !!
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खुबसूरत थे वोह पल जब तुम साथ थे
मासूम थे वोह पल जब तुम साथ थे
नाज़ था हमे खुद पे जब तुम साथ थे
जलते थे लोग हमसे जब तुम साथ थे
आजकल तो बस हम खयालो में रहते है
दुनिया की हर खबर से बेखबर रहते हैं
लोग कहते हैं आजकल हम पागल से दीखते हैं
कुछ तो था जो बदल गया
सुबह की वोह मीठी बातें हमे आज भी सताती है
शाम की वोह तीखी बातें दिल को दुखाती हैं
कोई साथी तो था जो बदल गया
भीड़ में भी खुद को तनहा पाते हैं,
जब याद आते हैं वोह पल, जब तुम साथ थे
महफिल में भी रुला जाते हैं
जब याद आते हैं वोह पल, जब तुम साथ थे
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गर्मी की उस दोपहर में
हम जा बैठे पेड़ की छाव में
वहा हमने देखा ज़मीन पे बिखरे पड़े थे कुछ पत्ते
शायद कुछ दर्द छिपे थे उनके दामन में
शायद कुछ लब्ज़ अभी बाकी थे
हमने उनकी खामोशी को टटोला
उनके ज़ख्मो को थोड़ा सहलाया
उनके बिखरे ज़ज्बातों पे एक मरहम लगी थी
शायद उनके बुझते मन को एक आश मिली थी
सूखते आंसुओं के बीच से हमने उनकी आँखों को पढ़ा
मद्धम पड़ती साँसों के रफ़्तार को हमने जाना
कांपती जुबान से उन्होंने सुनाया अपने दिल का हाल
और फ़िर समझा हमने बेरहम पेड़ की चाल
पत्ते बोले,
एक ऐसा ज़माना था जब हम पेड़ की जान हुआ करते थे
उसकी सांसो की रफ़्तार हुआ करते थे
हमसे शुरू होती थी उसकी ज़िन्दगी
और हमी से होती थी उसकी बंदगी
हमारी सुबह उसके लिए लाती थी आशा की एक नई किरण
हमारी हरियाली में छिपा था उसका जीवन मरण
फ़िर आया एक दिन हमारी हरियाली हुई थोडी मद्धम
अब बारी थी पेड़ की
हमे आशा थी थोड़े दुलार की
थोडी वफ़ा की और थोड़े प्यार की
पेड़ ने फ़िर खायी पलटी
बना लिए कुछ नए रिश्ते
कुछ नए हमसफ़र
तोड़ लिया हमसे नाता
और ला दे पटका हमे इस धूल में
पेड़ की इस बेरुखी ने हमारी सारी उमीदों को तोड़ दिया
और उसके बाद ज़िन्दगी ने भी हामारा दामन छोड़ दिया
हमने फ़िर उनको समझाया
उनका हौसला बढाया
हमने कहा ये तो ज़िन्दगी का दस्तूर है
आप चाहो छाव तो मिलता धुप है
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फूलों का होगा एक बाग़, ऐसा सोचा था हमने,
कुछ क्यारियां, कुछ पौधे, और पौधों पे होंगी कुछ कलियाँ
ऐसा सोचा था हमने.. २
सपनो की होगी एक दुनिया, कुछ पल होंगे अनोखे,
हल्की सी होगी बारिस और कुछ बुँदे होंगे बिखरे,
सुबह होगी सुहानी सी और शाम होगी मस्तानी सी,
रात को तारो के संग कुछ पल होंगे अपने,
ऐसा सोचा था हमने.. २
देखी थी एक मंजिल और इरादे किए थे पक्के,
ख़ुद पे था भरोसा और कदम उठे थे सच्चे,
दोस्ती की होगी बहार और प्यार की होगी बरसात,
राह में मिलेंगे सारे अपने,
ऐसा सोचा था हमने.. २
फ़िर आया एक भूचाल, उजड़ गया वो बाग़,
बारिस के साथ में आ गया तूफान,
सुबह हो गई अनजानी सी और शाम हो गई बेगानी सी,
ना रही वो मंजिल ना रहे वो इरादे,
ना रही दोस्ती ना रहा प्यार,
रह गई बस आन्सूवों की बोछ्हार,
आज फ़िर से देखा सपनो को टूटते हमने,
चल पड़े हम फ़िर से दुनिया को समझने,
शायद मिल जाए हमे फ़िर से कुछ अपने,
ऐसा सोचा है हमने.. २
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हर शाम को हम उनका नाम लिया करते हैं
दिल के ज़ख्मो को थोड़ा और ताज़ा करते हैं
उनकी खुशियों के किस्से तमाम गढ़ते हैं
एक उम्मीद, एक आशा में जिया करते हैं
कुछ बातें, कुछ कसमे याद करते हैं
और उनकी बेवफा आँखों में हम आज भी वफ़ा ढूँढा करते हैं
लोग कहते हैं,
हम गम के सौदागर हैं, गमो का सौदा करते हैं
अपनी मुस्कराहट बेच देते हैं और उनका गम खरीद लेते हैं
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