फूलों का होगा एक बाग़, ऐसा सोचा था हमने,
कुछ क्यारियां, कुछ पौधे, और पौधों पे होंगी कुछ कलियाँ
ऐसा सोचा था हमने.. २
सपनो की होगी एक दुनिया, कुछ पल होंगे अनोखे,
हल्की सी होगी बारिस और कुछ बुँदे होंगे बिखरे,
सुबह होगी सुहानी सी और शाम होगी मस्तानी सी,
रात को तारो के संग कुछ पल होंगे अपने,
ऐसा सोचा था हमने.. २
देखी थी एक मंजिल और इरादे किए थे पक्के,
ख़ुद पे था भरोसा और कदम उठे थे सच्चे,
दोस्ती की होगी बहार और प्यार की होगी बरसात,
राह में मिलेंगे सारे अपने,
ऐसा सोचा था हमने.. २
फ़िर आया एक भूचाल, उजड़ गया वो बाग़,
बारिस के साथ में आ गया तूफान,
सुबह हो गई अनजानी सी और शाम हो गई बेगानी सी,
ना रही वो मंजिल ना रहे वो इरादे,
ना रही दोस्ती ना रहा प्यार,
रह गई बस आन्सूवों की बोछ्हार,
आज फ़िर से देखा सपनो को टूटते हमने,
चल पड़े हम फ़िर से दुनिया को समझने,
शायद मिल जाए हमे फ़िर से कुछ अपने,
ऐसा सोचा है हमने.. २
Wowwwwwwwww, what to say, it’s everyone’s story. I could see whole life in these few line. Exceptional!!!!!
बहुत अच्छा लिखते हैं!
ब्रजेश,
आपके तारीफ से हमे लगा की शायद ये कविता के जन्म को चरितार्थ करती है ! आपकी प्रशंसा के लिए बहुत बहुत धन्यवाद !!!
विनय,
धन्यवाद बंधू, आशा है आप आगे भी हमारा हौसला बढ़ते रहेंगे !
wowww man, tumhare poem se ghar ki yaad aane lagti hai.
kitna deep sochte hain aap…
Very realistic poem…
Says the truth of relations.
Nice one…