गर्मी की उस दोपहर में
हम जा बैठे पेड़ की छाव में
वहा हमने देखा ज़मीन पे बिखरे पड़े थे कुछ पत्ते
शायद कुछ दर्द छिपे थे उनके दामन में
शायद कुछ लब्ज़ अभी बाकी थे
हमने उनकी खामोशी को टटोला
उनके ज़ख्मो को थोड़ा सहलाया
उनके बिखरे ज़ज्बातों पे एक मरहम लगी थी
शायद उनके बुझते मन को एक आश मिली थी
सूखते आंसुओं के बीच से हमने उनकी आँखों को पढ़ा
मद्धम पड़ती साँसों के रफ़्तार को हमने जाना
कांपती जुबान से उन्होंने सुनाया अपने दिल का हाल
और फ़िर समझा हमने बेरहम पेड़ की चाल
पत्ते बोले,
एक ऐसा ज़माना था जब हम पेड़ की जान हुआ करते थे
उसकी सांसो की रफ़्तार हुआ करते थे
हमसे शुरू होती थी उसकी ज़िन्दगी
और हमी से होती थी उसकी बंदगी
हमारी सुबह उसके लिए लाती थी आशा की एक नई किरण
हमारी हरियाली में छिपा था उसका जीवन मरण
फ़िर आया एक दिन हमारी हरियाली हुई थोडी मद्धम
अब बारी थी पेड़ की
हमे आशा थी थोड़े दुलार की
थोडी वफ़ा की और थोड़े प्यार की
पेड़ ने फ़िर खायी पलटी
बना लिए कुछ नए रिश्ते
कुछ नए हमसफ़र
तोड़ लिया हमसे नाता
और ला दे पटका हमे इस धूल में
पेड़ की इस बेरुखी ने हमारी सारी उमीदों को तोड़ दिया
और उसके बाद ज़िन्दगी ने भी हामारा दामन छोड़ दिया
हमने फ़िर उनको समझाया
उनका हौसला बढाया
हमने कहा ये तो ज़िन्दगी का दस्तूर है
आप चाहो छाव तो मिलता धुप है
aapme to kavi ke sare Gunn vidyamaan hai
छोटी सी कोशिश कर रहा हूँ ज़ज्बातों को शब्दों में ढालने की !!!
बहुत सुन्दर, यार बहुत अच्छा लिखते हो
achchi koshish hai aage aur behtar ki umeed hogi ,
naye varsh ki haardik shubhkaamanaye
अम्बुज,
बात सीधे-सीधे दिल में उतर जाती है, यदि मैं पत्तों को बदल दूँ बुढाती काया में तो आप अन्यथा नही लेगें. प्रतिको के माध्यम से कहती हुई बहुत ही प्रभावी रचना.
बधाईयाँ.
मुकेश कुमार तिवारी
i m preparing this poem as a song. i will definitely give a good voice to this poem .