समय के सफ़र में प्रहर जब रात का आया,
कोई भूल गया वो अपना साथी जो था !
मंजिल की दौर में प्रहर जब हार का आया,
कोई भूल गया वो अपना साथी जो था !
जीत की ख़ुशी में, हार के गम में,
याद आ गया वो अपना साथी जो था !
मन के अन्तः करण में जब प्यार को संजोया,
याद आ गया वो अपना साथी जो था !
नित्य कृत पर्व में, गर्त में, प्रशाध्य में,
श्रीन्खलाय मार्ग में, ज्ञान के प्रवाह में,
सांख्य स्मृति में, जीवन के अध्याय में,
हर पल के बहाव में,
याद आ गया वोह अपना साथी जो था,
याद आ गया वोह अपना साथी जो था !
मेघ के प्रवाह में प्रहर जब वेदना का आया,
कोई भूल गया वो अपना साथी जो था !
समय के सफ़र में प्रहर जब हार का आया,
कोई भूल गया वो अपना साथी जो था,
कोई भूल गया वो अपना साथी जो था !!

beautifully expressed..reminds me of those poems i used to read in balbharti. you have crafted your verses beautifully kudos.
5th stranza i cant understand
Meeta,
Thanks a lot. These verses came in a very emotional moment and good to know that it touched some soft points of your heart…
Cheers,
Ambuj
Megha,
नित्य कृत – Daily Routine
पर्व – Festival
गर्त – Fall
प्रशाध्य – Fame
श्रीन्खलाय – Series
मार्ग – Road
सांख्य – Numbers
I hope you can understand it now. Lemme know if there’s still some problem.
Cheers,
Ambuj
thanq so much
deep deep feelings..aap bahot accha likhte ho..kuch hat kar